कौन है वो जो इंसान अपने को कहता है
जाति,धर्म,रंग,वर्ण से खुद को श्रेष्ठ कहता है
किसी धर्म,जाति रंग वर्ण का ईश्वर ने इंसान नहीं बनाया है
उसने तो माटी का पुतला बनाया है और माटी में मिलाया है
जानवर भी जानवर को पेट भरने को मार खाता है
पर जिससे कोई तेरा सरोकार नहीं उसे क्यों बम से उड़ाता है
अपनी आजादी चाहता है
पर ये कैसी आजादी है
आजादी तो सुख के लिए सबको सुखी रखने के लिए होती है
तेरी अपनी भी और जिसकी गोद उजड़ी वो भी मां रोती है
चोट किसी को भी लगे हर एक मां को टीस होती है
पर वो क्या आजादी चाहते हैं
जो बेकसूर भोले-भालों को बम से उड़ाते है
नहीं जानते कौन धमाके में उड़ जाएगा
कौन किस-किस को छोड़ काल का ग्रास बन गाएगा
वो खुद क्या खाक जीते हैं
उने कदम –कदम पर मौत जिसके साए औ भय में खते पीते हैं
भय में जीते ये कायर देते हैं भय का माहौल
इन्हे जीना नहीं आता जीवन को बना देते हैं ये मखौल
दहशत के नाम पर बम छिपा कर रख जाते हैं
अपने आका को खुश रखने को मानव बम बन जाते हैं
किसी के इशारे पर शरीर पर बारूद बांध मानव बम बन जाते हैं
कायर हैं उनके आका खुद तो मूंह छिपाए घर में दुबक जाते हैं ।
धर्म के नाम पर कब तक खून बहाओगे
क्या इन बमों के धमाकों से कुछ हासिल कर पाओगे
इस खून से सनी धरती पर क्या उगाओगे
नफरत बोओगे तो कैसे किसी का प्यार पाओगे
इंसान का जो हो न सका वो ईश्वर का कैसे हो पाएगा
आज किसी को वो उड़ा रहा कल उसे कोई उड़ाएगा
विधि का विधान है जो जैसा बोएगा वैसा ही फल पाएगा ।।
Wednesday, July 30, 2008
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