मैं ठीक हूं शादी-विवाह, बच्चों का जन्म, नामकरण, मरण आदि इत्यी कई कारंण हैं अपस मे मेल मिलाप के । मिलने-जुलने से ही समाज आगे बढ़ता है। तनसुख राम जी हमरे मित्र हैं। अब उनका नाम तनसुख इनके माता-पिता ने रखा तो इसमें तनसुख जी का क्या दोष हमारे यहां नाम तब ही रख दिया जाता है जैसे ही बच्चे का जन्म होता है उससे पूछा तो जाता नहीं चलो अगर कोई पूछना भी चाहे तो वो बताने के काबिल भी तो नहीं होता और जब बताने के काबिल होता है तो कोई सुनता नहीं।यदि सभी को अपना नाम रखने की छूट दे दी जाए तो शायद उत्तर पश्चिम भारत में 80 प्रतिशत बच्चों का नाम धोनी या रितिक रोशन या एश्वर्या राय ही होता।अरे मैं कहां बहक चला नाम के चक्कर में मैं तो आपको तनसुख राम का किस्सा बताने वाला था। हमारे तनसुख के पास तन तो है भरपूर पर उसमें सुख का अभाव मानते हैं वो जानते हैं कि शरीर नश्वर होता है इस लिए उस पर अधिक इनवेस्टमेंट करना व्यर्थ है। बस इस शरीर में प्राण पले रहें इतना भर ही काफी है।उन्हें समझाने वाला मूर्ख ही होगा क्यों कि उन्हें लगता है कि किसी के समझाने से सम1ने में मूर्खता होगी अर्थात अगर वे समझने से समझ गए तो इसका मतलब होगा कि पहले वो नासमझी के काम कर रहे थे।हम भी चार मित्रों की चौकड़ी में विचरण करने वाले जीव हैं दर्शन,रंजीत रावत और मैं भी इस चौकड़ी के सदस्य हैं जहां भी जाते हैं इकठ्ठे ही जाते हैं मेरा मतलब किसी सामाजिक कार्यक्रम से है आप अधिक न समझ।
तन सुख जी बीमार होना ही मेल-मिलाप का सबसे उत्तम साधन मानते हैं । घर आने वाले मरीज का हाल चाल लेने के लिए कुछ न कुछ फल आदि ले ही आते हैं और बीमार के हाल चाल बताने में आने वाले का स्वागत भी कोई नहीं करे तो कोई फर्क भी नहीं पड़ता। कराह-कराह के आसमान सर पर उठा लेते हैं कि आने वाला समझ लेता है कि अब दो मिनट और रुका तो अपना कंधा देना पड़ सकता है । बस हर कोई उन्हे शीध्र स्वास्थय लाभ का आशीर्वाद दे फल आदि वहीं पटक निकल लेता है। मरीजदर्शनार्थी के जाते ही तन सुख भले चंगे हो उसके लाए फलों पर टूट पड़ते हैं। पर हमारी चांडाल चौकड़ी से भला कौन बच पाया है । भाई हम तो अपनी पर उतर आएं तो किसी बुजुर्ग की अर्थी से छुआरे लूट कर खीर बना खाएं। किसी को कुछ देने का हमारे यहां कोई चलन ही नहीं है। शादी में सगुन न दें,भिखारी को बक्शीष न दें
तनसुख बीमार हो भला उसका हाल चाल लेने हम न जाएं ये कहां की इंसानियत होगी।फिर उस मरीज पर न जाने कितने लोग फल चढ़ा गए होंगे अगर वो इन सब को खा गया तो कल का मरता आज मर जएगा और न खा पाया तो फल अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे। न ना ऐसा तो हम कदापि न होने देंगे अगर वो अति फलाहार से मर गया तो हम मित्रों पर बड़ा कलंक लगेगा। बस हम जा पहुंचे तनसुखिया धाम (घर) हमें देखते ही उसने खटोला पकड़ लिया जा लेटा छोटे से खटोले पर और लगा बीमारी राग अलापने (कराहने) । रंजीत बाबू ने उनके खटोले की पाटी पर जगह बनाते हुए कहा यार तूने बताया नहीं तू इतना बीमार है। तन सुख जी ने पैर मोड़ जगह बनाई बोले आओ बैठो ,दर्शन जी ने चिंता जताई हां आज कल बीमारी भी बहुत फैल रहीं हैं और खटोले का दूसरा किनारा पकड़ लिया तन सुख जी ने हाथ मोड़ते हुए उन्हें भी एडजस्ट किया खटोले पर। रावत जी ने दम मारते हुए बताया देखो आज कल मिलावट भी तो कितनी हो रही है हर चीज में साला कुछ भी खाना पीना बीमारी को दावत देना है।अच्छा खसा आदमी बीमार पड़ जाए बीमार की तो चलती ही क्या है। फलों में रंगों की सैक्रीन की मिलावट कर रहे हैं सले नर्क में जाएंगे पास रखा सेब उठा जबड़ों मे कसते हुए खटोले पर धस गए,तनसुख ने शरीर पतला कर इन्हें भी एडजस्ट किया । अभी मेरा तसल्लीनामा बाकी था मैंने उन्हें झिड़की दी अबे साले तनसुखिया हम लोग तेरे हाल चाल पूछने आए हैं घर में और कोई भी तेरा ध्यान रख रहा है कि नहीं ,भाभी जी नजर नहीं आ रहीं बाहर गईं हैं क्या । तन सुख जी ने बताया वो अंदर हैं । अबे हैं तो ठीक-ठाक रंजीत ने पूछा। जी वो तो ठीक हैं । रावत ने बोला चल फिर चाय वाय तो बनवा हमारे लिए । अब ये मरीज बेचारा क्या आवाज देगा भाभी को चलो में ही अंदर जा कर बोल आता हूं दर्शन ने अपना समाजसेवी धर्म निभा दिया । हमने तनसुख जी को समझाने के लिए बताया देख भाई हमारे पास तो फलतू वक्त होता नहीं कि लोगों के हाल चाल पूछने उनके घर जाते रहें आज कल इतनी दवाएं और सुविधाएं हो गईं हैं कि सब भले चंगे हो ही जाते हैं अब ऐसा तो है नहीं कि हम हाल नहीं पूछेगे तो तुम मर ही जाओगे।अरे भाई तुम तो किस्मत वाले हो वरना हम तो किसी भी मरीज के मर जाने पर केवल शव यात्राओं में ही शामिल होने जाते हैं, चलो ए खुशकिस्मत इंसान भाभी चाय तो बना रहीं हैं उन्हें बोल पकौड़े सकौड़े भी तल लेंगी, बोलते बोलते हमने भी खटोले में स्थान बना लिया पर हमरे स्थान के चक्कर में तनसुख जी जमीन पर जा पड़े अब एक खटोले पर चार-चार मुस्तंडे आ मरेंगे तो उस पर कितनी जगह बचेगी पर हमरी भलमनसात तो देखिए हमने तनसुख जी को उठा खटोले पर अपने साथ फिट कर ही लीया आखिर मरीज को आराम मिलना चाहिए । हम चारों ने चारों ओर से कस कर पकड़ लिया तनसुख जी को कहीं खटोले पर स्थानाभाव के कारण दोबारा जमीन पर न गिर पड़े ।
अब आप जानो हमरा भी कोई सम्मान है लोग चाय वाय पिला ही देते हैं और जो नहीं पिलाते उनके घर से हम तब तक नहीं टलते जब तक वो चाय न पिलवा दे भले ही हमें चार दिन उनके घर पर टिकना पड़े। तन सुख भी हमसे भली भांति परिचित हैं रावत जी ने उनके लिए रखे गए फल निबटाने के बाद डायलाग मारा भाभी कुछ ढीली हैं क्या अभी चाय नहीं बनी क्या। आरे भाग्यवान चाय ले आओ और कितनी देर लगाओगी अरे मेरा दम निकलने पर लाओगी मुझे दबा मरेंगे खटोले पर जल्दी ले आ ।
चाय आई भी हमने पी भी पकौड़े भी तले गए और हमने खाए भी।हां वहां से हम निकले भी क्या करें निकलना ही पड़ा बेचारे तनसुख जी को लोगों ने अस्पताल जो ले जाना था क्यों वो इस लिए कि हम चारों के खटोले पर बैठने से उनका दम जो फूल गया था। -अब वो पता नहीं कब स्वस्थ होगे उनके घर वालों ने वो खटोला खड़ा कर दिया है. जिसकी वजह से तनसुख जी अस्पताल पहुंचे। हम चारों ने सोच रखा है कि एक बार और जाएंगे उनके घर चाय पकौड़े लूटने यदि उनकी बीमारी चार छह दिन और चली तो वरना उनकी तेरहवीं में जाएंगे दावत उड़ाने......
तन सुख जी बीमार होना ही मेल-मिलाप का सबसे उत्तम साधन मानते हैं । घर आने वाले मरीज का हाल चाल लेने के लिए कुछ न कुछ फल आदि ले ही आते हैं और बीमार के हाल चाल बताने में आने वाले का स्वागत भी कोई नहीं करे तो कोई फर्क भी नहीं पड़ता। कराह-कराह के आसमान सर पर उठा लेते हैं कि आने वाला समझ लेता है कि अब दो मिनट और रुका तो अपना कंधा देना पड़ सकता है । बस हर कोई उन्हे शीध्र स्वास्थय लाभ का आशीर्वाद दे फल आदि वहीं पटक निकल लेता है। मरीजदर्शनार्थी के जाते ही तन सुख भले चंगे हो उसके लाए फलों पर टूट पड़ते हैं। पर हमारी चांडाल चौकड़ी से भला कौन बच पाया है । भाई हम तो अपनी पर उतर आएं तो किसी बुजुर्ग की अर्थी से छुआरे लूट कर खीर बना खाएं। किसी को कुछ देने का हमारे यहां कोई चलन ही नहीं है। शादी में सगुन न दें,भिखारी को बक्शीष न दें
तनसुख बीमार हो भला उसका हाल चाल लेने हम न जाएं ये कहां की इंसानियत होगी।फिर उस मरीज पर न जाने कितने लोग फल चढ़ा गए होंगे अगर वो इन सब को खा गया तो कल का मरता आज मर जएगा और न खा पाया तो फल अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे। न ना ऐसा तो हम कदापि न होने देंगे अगर वो अति फलाहार से मर गया तो हम मित्रों पर बड़ा कलंक लगेगा। बस हम जा पहुंचे तनसुखिया धाम (घर) हमें देखते ही उसने खटोला पकड़ लिया जा लेटा छोटे से खटोले पर और लगा बीमारी राग अलापने (कराहने) । रंजीत बाबू ने उनके खटोले की पाटी पर जगह बनाते हुए कहा यार तूने बताया नहीं तू इतना बीमार है। तन सुख जी ने पैर मोड़ जगह बनाई बोले आओ बैठो ,दर्शन जी ने चिंता जताई हां आज कल बीमारी भी बहुत फैल रहीं हैं और खटोले का दूसरा किनारा पकड़ लिया तन सुख जी ने हाथ मोड़ते हुए उन्हें भी एडजस्ट किया खटोले पर। रावत जी ने दम मारते हुए बताया देखो आज कल मिलावट भी तो कितनी हो रही है हर चीज में साला कुछ भी खाना पीना बीमारी को दावत देना है।अच्छा खसा आदमी बीमार पड़ जाए बीमार की तो चलती ही क्या है। फलों में रंगों की सैक्रीन की मिलावट कर रहे हैं सले नर्क में जाएंगे पास रखा सेब उठा जबड़ों मे कसते हुए खटोले पर धस गए,तनसुख ने शरीर पतला कर इन्हें भी एडजस्ट किया । अभी मेरा तसल्लीनामा बाकी था मैंने उन्हें झिड़की दी अबे साले तनसुखिया हम लोग तेरे हाल चाल पूछने आए हैं घर में और कोई भी तेरा ध्यान रख रहा है कि नहीं ,भाभी जी नजर नहीं आ रहीं बाहर गईं हैं क्या । तन सुख जी ने बताया वो अंदर हैं । अबे हैं तो ठीक-ठाक रंजीत ने पूछा। जी वो तो ठीक हैं । रावत ने बोला चल फिर चाय वाय तो बनवा हमारे लिए । अब ये मरीज बेचारा क्या आवाज देगा भाभी को चलो में ही अंदर जा कर बोल आता हूं दर्शन ने अपना समाजसेवी धर्म निभा दिया । हमने तनसुख जी को समझाने के लिए बताया देख भाई हमारे पास तो फलतू वक्त होता नहीं कि लोगों के हाल चाल पूछने उनके घर जाते रहें आज कल इतनी दवाएं और सुविधाएं हो गईं हैं कि सब भले चंगे हो ही जाते हैं अब ऐसा तो है नहीं कि हम हाल नहीं पूछेगे तो तुम मर ही जाओगे।अरे भाई तुम तो किस्मत वाले हो वरना हम तो किसी भी मरीज के मर जाने पर केवल शव यात्राओं में ही शामिल होने जाते हैं, चलो ए खुशकिस्मत इंसान भाभी चाय तो बना रहीं हैं उन्हें बोल पकौड़े सकौड़े भी तल लेंगी, बोलते बोलते हमने भी खटोले में स्थान बना लिया पर हमरे स्थान के चक्कर में तनसुख जी जमीन पर जा पड़े अब एक खटोले पर चार-चार मुस्तंडे आ मरेंगे तो उस पर कितनी जगह बचेगी पर हमरी भलमनसात तो देखिए हमने तनसुख जी को उठा खटोले पर अपने साथ फिट कर ही लीया आखिर मरीज को आराम मिलना चाहिए । हम चारों ने चारों ओर से कस कर पकड़ लिया तनसुख जी को कहीं खटोले पर स्थानाभाव के कारण दोबारा जमीन पर न गिर पड़े ।
अब आप जानो हमरा भी कोई सम्मान है लोग चाय वाय पिला ही देते हैं और जो नहीं पिलाते उनके घर से हम तब तक नहीं टलते जब तक वो चाय न पिलवा दे भले ही हमें चार दिन उनके घर पर टिकना पड़े। तन सुख भी हमसे भली भांति परिचित हैं रावत जी ने उनके लिए रखे गए फल निबटाने के बाद डायलाग मारा भाभी कुछ ढीली हैं क्या अभी चाय नहीं बनी क्या। आरे भाग्यवान चाय ले आओ और कितनी देर लगाओगी अरे मेरा दम निकलने पर लाओगी मुझे दबा मरेंगे खटोले पर जल्दी ले आ ।
चाय आई भी हमने पी भी पकौड़े भी तले गए और हमने खाए भी।हां वहां से हम निकले भी क्या करें निकलना ही पड़ा बेचारे तनसुख जी को लोगों ने अस्पताल जो ले जाना था क्यों वो इस लिए कि हम चारों के खटोले पर बैठने से उनका दम जो फूल गया था। -अब वो पता नहीं कब स्वस्थ होगे उनके घर वालों ने वो खटोला खड़ा कर दिया है. जिसकी वजह से तनसुख जी अस्पताल पहुंचे। हम चारों ने सोच रखा है कि एक बार और जाएंगे उनके घर चाय पकौड़े लूटने यदि उनकी बीमारी चार छह दिन और चली तो वरना उनकी तेरहवीं में जाएंगे दावत उड़ाने......

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