
एक शब्द मिला कल मुझे सड़क पर
बढ़ा रहा मुझे देख कर अपने कर
क्य मुझे गले न लगाओगे
सड़क का जान या मुझे ढुकराओगे
नहीं मेरा कोई धर्म न मेरी कोई जाति,
जहां भी चाहो मुझे लगालो असीम हे मेरी ख्याति,
मेरा मोल नही बदलता ,
जितना सेठ के पास उतना गरीब पर चलता,
अच्छा न बुरा मैं हूं ,गरीब की रोटी में मैं हूं ,
गरीब की धोती में मैं हूं
अमीर के व्यंजन में मैं हूं,
अमीर के श्रृंगार में मैं हूं ,
तकरार में मैं हूं, प्यार में मैं हूं
सुहागन के सिंदूर में मैं रहता ,
अभागन पर अत्याचार मैं सहता,
जैसा चाहो मुझे बनालो,
साथ हूं मैं चाहे मुझे ठुकरालो,
पायल की झंकार में मैं ,
तलवार की टंकार में मैं,
मुझसे कतराना व्यर्थ है
कवि पाता मुझसे अर्थ है,
घर को मैं बनाता घर को उजाड़ता भी मैं,
बगिया संवारता और उसे उखाड़ता भी मैं,
ब्रह्मा की रचना हूं मैं,
मैं शब्द हूं चाहे जैसे अपनाओ ,
चाहे मुझे पहनो ओढ़ो या खा जाओ,
तुम्हारे हाथ हूं जहां चाहे मुझे सजाओ,
में तो रहूंगा चाहे छोड़ो या अपनाओ
बढ़ा रहा मुझे देख कर अपने कर
क्य मुझे गले न लगाओगे
सड़क का जान या मुझे ढुकराओगे
नहीं मेरा कोई धर्म न मेरी कोई जाति,
जहां भी चाहो मुझे लगालो असीम हे मेरी ख्याति,
मेरा मोल नही बदलता ,
जितना सेठ के पास उतना गरीब पर चलता,
अच्छा न बुरा मैं हूं ,गरीब की रोटी में मैं हूं ,
गरीब की धोती में मैं हूं
अमीर के व्यंजन में मैं हूं,
अमीर के श्रृंगार में मैं हूं ,
तकरार में मैं हूं, प्यार में मैं हूं
सुहागन के सिंदूर में मैं रहता ,
अभागन पर अत्याचार मैं सहता,
जैसा चाहो मुझे बनालो,
साथ हूं मैं चाहे मुझे ठुकरालो,
पायल की झंकार में मैं ,
तलवार की टंकार में मैं,
मुझसे कतराना व्यर्थ है
कवि पाता मुझसे अर्थ है,
घर को मैं बनाता घर को उजाड़ता भी मैं,
बगिया संवारता और उसे उखाड़ता भी मैं,
ब्रह्मा की रचना हूं मैं,
मैं शब्द हूं चाहे जैसे अपनाओ ,
चाहे मुझे पहनो ओढ़ो या खा जाओ,
तुम्हारे हाथ हूं जहां चाहे मुझे सजाओ,
में तो रहूंगा चाहे छोड़ो या अपनाओ

3 comments:
पेसे के बारे आप ने किस ढगं से लिखा मजा आ गया, लेकिन बिलकुल सही लिखा हे आप ने.
धन्यवाद
kafi achhe dhang se aapne shabdon ki vyaapakta ko samne rakha hai,alag-alag saache,anginat rup......bahut sundar
भाई जी आप सच्चे कलमकार हो, भावों के शिल्पकार हो, शब्दो के कुंभकार हो,हिन्दी जगत के सृजनहार होI आपको हार्दिक बधाई स्वीकार हो
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