जब कुत्ते कटखने हो जाते हैं
तब ही तो हम उनसे घबराते हैं
पर काटना उन्हें किसने सिखाया
उन्हें भौकना किसने सिखाया
नहीं जानते कौन कब क्या बन जाए
कौन भौके कौन कूके कौन गाए
वक्त ही भागता है वक्त ही भगवाता है
वक्त ही दौड़ाता है और दौड़वाता है
वक्त ही काटना सिखता है और कटवाता है
अगर उस वक्त उसे कुत्ता न कहा होता
तो आज वो बछड़ा गाय या
आप सा मुझ सा उन सा
सब सा हम सा इंसान होता..

2 comments:
आपको पढना , सत्य की आंच महसूस करना है,
एक-एक भाव एक नयी दिशा,एक अलग मनोभाव
की ओर इंगित करते हैं,
मुख्य बात यही है की हम क्या सोचते हैं,
आपकी शब्द रचना ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया है....
एक सच्ची बात आप ने अपनी कविता मे लिख दी , बहुत सुन्दर भाव धन्यवाद
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