Friday, August 22, 2008

वो भी इंसान होता


जब कुत्ते कटखने हो जाते हैं
तब ही तो हम उनसे घबराते हैं
पर काटना उन्हें किसने सिखाया
उन्हें भौकना किसने सिखाया
नहीं जानते कौन कब क्या बन जाए
कौन भौके कौन कूके कौन गाए
वक्त ही भागता है वक्त ही भगवाता है
वक्त ही दौड़ाता है और दौड़वाता है
वक्त ही काटना सिखता है और कटवाता है
अगर उस वक्त उसे कुत्ता न कहा होता
तो आज वो बछड़ा गाय या
आप सा मुझ सा उन सा
सब सा हम सा इंसान होता..

2 comments:

रश्मि प्रभा... said...

आपको पढना , सत्य की आंच महसूस करना है,
एक-एक भाव एक नयी दिशा,एक अलग मनोभाव
की ओर इंगित करते हैं,
मुख्य बात यही है की हम क्या सोचते हैं,
आपकी शब्द रचना ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया है....

राज भाटिय़ा said...

एक सच्ची बात आप ने अपनी कविता मे लिख दी , बहुत सुन्दर भाव धन्यवाद