Sunday, March 20, 2011
Saturday, March 19, 2011
शीला की जवानी

हमारी तो पिछले साल भी हो ली थी और इस साल फिर आ गई होली. होली में रंग,भंग उमंग,तरंग में मैं भी सभी की तरह में भी मगन हूं. पीछले साल होली में मैं... क्या हुआ मेरे साथ क्या बताऊं पर बताना भी जरूरी है जब किसी को जूते पड़ते हैं तो मजा आता है और समझ भी आता है क्या करना है, कितना करना और कितना बचना है.उस होली को सालों साल बीत चुके है पर ऐसा लगता है कि कल ही पिटा था...
घबराने की क्या बात है गुलाब के शौकीन हो तो कांटे क्या चाचा को दोगे नहीं जनाब कांटे तो आपको ही झेलने हैं.चाचा को अपने ही कांटे समेटने हैं.
ज्यदा समझदारी नहीं दिखाते हुए आपको आपनी उस होली की कहानी बताता हूं सुन लो और हो सके तो कुछ सीख लेना ... तो मैं बस बसस्टैंड पर पहुंचा ही था बस बस ही हमारे बस मैं नहीं होती आती है तो आती ही रहतीं हैं नहीं आती बस हीं आती करलो जो तुम्हारे बस में हो.एक जेब में गुगाल और दुसरी में रंग की बोतल की उपस्थिती ली कुर्ते की ऊपर की जेब में सम्हाली थी कुछ आकस्मिकता निधी . मन में तो गुंजिया फूल रही थी आज मैं होली खेलने जा रहा था अपनी पुरानी सहपाठनी के साथ हमारे साथ कालेज में ही पढ़ती थीं शीला जी कितनी कोशिश की उसे पटाने की पटी ही नहीं और शादी भी हुई उसकी की तो हमारे ही साथी चमन लाल से आज के समय में ये नाम जितना पुरातन है वो उससे भी कहीं अधिक पुरातन निकला पास के ही मोहल्ले में दो स्टेड के अंतर पर रहता है पर साला कभी भी शीला को दिखाने घर नहीं लाया था. वो तो भला हो इस युग के जनाना बाजार का मतलब शनि बाजार का जी हां वहीं मिल गई थी शीला मुझे, उसी ने अपने घर का पता दे दिया था कभी उसके घर आने के निमंत्रण के साथ. पर आज तो होली है उसके घर जाना बनता है.
इसी सब विचारों की जोड़ - तोड़ ने बस में चढ़ा दिया और दो स्टेंड बाद उतरवा भी दिया बस से . शीला अब भी पूरी तरह आकर्शक फिट है वही जवानी की मस्ती उसके पूरे के पूरे शरीर में बनी हुई है उतना ही आज भी में फिदा हूं अब तो शायद घास चर भी जाए कालेज में तो उसके पास पूरा कालेज ही विकल्प था पर अब तो होली खेलने के लिए में या चमन लाल दो ही विकल्प हैं ...हां चमन से तो में बाजी सार ही लूंगा साला न रंग में न ढ़ंग में मेरे सामने टिकता है न टिक पाएगा पता नहीं उसका बाप कमीना कहां से ढ़ूढ़ के लाया ये चमन लाल रूपी नगीना. चमन को लानत बरसाते-बरसाते ख्यालों में डूबे-डूबे मैंनें शीला के घर की घंटी दबा दी बरामदे मे एक दम से दो हाथ उठे और मेरे मूंह पर पड़े रंग भरे हाथ थे मेरा पूरा मूंह रंग डाला रंग भी कोई और नहीं काला होली मुबारक कह कर वो महाशय गले मिलने को आतुर हुए मेंनं तो सोचा था कि आज सबसे पहले शीला को और उसीसे रंग लगवाऊंगा साले ने पहले ही पहले आपशगुन कर दिया मन तो किया दो थाप दूं गधे के पर फिर मेंने सोचा इस बिचारे को होश तो है नहीं शराब की बदबू मार रहा है क्या कहूं इसे कहने का क्या फयदा दारू पीए को समझाने का कोई नही होता कायदा. विचार किया कि घर जा कर मूंह धो आना चाहिए पहली बार किसी के घर मूंह काला करवा कर नहीं जाना चाहिए हां आगर कोई काला करवा ले तो ....
आप सच मानिए में शीला के घर मूंह काला करवा कर बिल्कुल नहीं जाना चाहता पर जब शीला की जवानी थी तब की बात और थी अब तो मैं भी शदी शुदा हूं अभी घर वापस जाने की सोच ही रहा था कि दरवाजा खुल गया ....अंदर भी कोई हालात खास ठीक नहीं थे में बाहर कलमूंहा था तो अंदर से कलमूंही ने दरवाजा खोला (दोंने ही रंगे पुते) चलो कूछ तो झिझक कम हुई शीला जी नमस्ते भाई साहब हैं घर ...वो बोलीं वो क्या पड़ा है बरामदे में उजड़ा सुबह से न जाने कितनी पी रखी है अंदर ही नहीं आ रहे..मैं बेचारी होली में अकेली बैठी हूं अंदर इनकी वजह से बाहन भी नहीं निकल पा रही...
मेरे मन के टनों लड्डू धूमधड़ाका करते फूट पड़े मन में आया कि आज मनोकामना पूरी होगी...
मन से अनायास ही नीकला मैं तो आपके ही साथ होली खेलने आया हूं ...रंग लगा कर ही जाऊंगा कब से आपको रंग लगाने की आस पाली हुई है मन में ....वो बोली अरे हमें तो पता ही नहीं लगा कि आप भी लाइन में थे लो बोलो हम अभी पूरी कि देते हैं आपकी आस..आइए अंदर आइए पहले कुछ खा पी लीजिए ...अंदर से शर्बत का गिलास और पकौड़े ले कर आ गईं ..में तो जमीन से आसमाल तक उछल गया बताओ इस पियक्कड चमन से शीला सी जवानी भी नहीं सम्हाली जाती ये नशा चीज ही ऐसी है खुद को तो करती ही करती है घर भर को भी बरबाद कर डालती है. पर मुझे क्या मुझे तो शायद दूसरा लड्डू भी हाथ लगने वाला था घर वाला तो घर पर है ही शीला का और मिलेगा आज..नशेड़ी चमन आज मुझे दानवीर कर्ण से भी बड़ा दानवीर नजर आ रहा था खुले दरवाजे मे मैं झांक कर धन्यवाद देना चाह रहा था कि शीला जी इठलाती हुईं बोली ये इसी लायक है पड़े रहने दो बाहर रंग लगाने आए हो कुछ जेब में लाए भी हो आज त्यौहार है या खाली हाथ ही चले आए हो ... मैंने गुलाल भरी जेब पर हाथ टिका दिया बोला चिंता मत करो जेब दोनों भरी हैं...शीला जी अब मुझे शीला लगने लगी क्योंकि जिसके पती में कमी हो वो सबकी भाभी बनने में देर नहीं करती मुझे ऐसा लगा. मैंने कहा दोनों में है दिखाऊं. नहीं रहने दो आपने कहा हमने माना ये लीजिए पकोड़ा तो अपने लिया ही नहीं और शीला ने अपने हाथ से पकौड़े देते-देते हुए पूरी प्लेट पमें चटा दी शर्बत से नीचे उतार पकौड़े मैं बोला अब हो जाए होली और मैनें जेब से गुलाल निकाला और गुलाल निकलता ही गया शीला अब आज तो हर तरह की होली होगी में बोला और उसके गाल पर रंग लगा दिया वो भी हाथ से रंग छीन कर मुझे रंगने लगी मैं तो फूल गुब्बारा हो गया मन किया कि बाहर पड़े चमन को दो लात दे मारूं मैं बोल भी पड़ा शीला जान अभी आता हूं साले को दो लगाता हूं नशेड़ी को शीला ने मेरी बांह पकड़ खींची न रहने दो उसे उसके हाल पर रंग लगा कर मुझे बेहाल कर न जाओ उसके खींचने से मेरा कुर्ता खिंच गया और फिर से थान हो गया और मैं शीला से लिपट कर शीला का हो गया मन से अनायास ही बोल फूटने लगे शीला हाय शीला की जवानी किसी को समझ न आनी मै उसके प्रेम में पगा पागल हुआ जा रहा था घर से रबाहर निकल चमन के चपत लगाने को छटपटा रहा शीला मुझे घर के अंदर खींच रही थी इसी खींचमतान में मेरे और शीला के कपड़े खिंचते फटते गए शरीर शीला के स्पर्ष मात्र से में सातवें से ऊंचे आसमान तक जाने लगा सुध-बुध जाने लगी जुबान मेरी शीला की जवानी गाने लगी.....
मैं न जाने किस जहांन में खो गया .....
जब उस जहांन से लौटा तो पाया पुलिस स्टेशन में जमीन पर औधा पड़ा हूं शरीर पर शरीर ढकने लायक भी कपड़े नहीं हैं पूलिस वालों से मेरे घर के पड़ौसी गुहार लगा रहे हैं साहब छोड़ दो ये बिल्कुल एसे नहीं है अब तो इसकी बीवी भी घर छोड़ जाने वाली है बच्चों के साथ बेचारे की हम जमानत देते हैं कोई फसा कर ले गया होगा इसे किसीने इसे नशा खिला दिया है धोखे से ये तो चाय तक नहीं पीता ...
पुलिस वाला अकड़ कर बोला चल नशा नहीं करता ये मानी तेरी पर उस लुगाई के साथ तो था यो कई दिन से वा के पड़ौसी कम्पलेंट कर रहे थे कि वा घर में धंधे वाली औरत है आज त्यौहार पर रेड में पकड़ा से हमने अपना त्यौहार खराब कर इब न छोड़ूं इसने...
देखा चमन लाल भी आया और शीला के साथ मेरी पत्त्नी भी आई चमन ने पुल्स वाले को एक पैकेट दिया तो वो बोला ले जा साले दोबारा मेरे सामने मति न आने दियो...
घर जा कर पता चला में उल्टी दिशा की बस में बैठ किसी और के घर पहुंच गया जहां कोई गलत औरत रहती थी उसने भांग के पकौड़े खिलला दिए मुझे और जब मेरी जेब से किराए के दस रुपए के सिवाय कुछ न निकला तो पुलिस बुलवाकर मुझे पिटवाया और थाने में जमा करवा दिया में पूरे समय शीला की जवानी गाता रहा और अपना जलूस निकलवाता रहा...
चमन भाई ने पांच हजार पुलिस को और दो हजार उस महिला को दे मुझे छुड़वाया .... अब मेरी पत्नी मुझे लुच्चा समझती है बच्चा अभी दो साल का है मुझे पापा ही समझता है पर मुझसे लोरी में शीला की जवानी सुनना चाहता है और सुन कर सोता भी है मैं इस तरह यह घटना और शीला की जवानी कभी नही भूल सकता....
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