Thursday, July 14, 2011


अस्पताल के बिस्तर पर मैं

अस्पताल के बिस्तर पर मैं,अधमरा सा पड़ा हुआ हूं,
जैसे जीते जी जीवन में,कर्मफल का नरक भुगत रहा हूं।
अस्पताल में आने वाले सब,डाक्टर नर्सेस व मिलने वाले
न चैन से जीने देते न चैन से मरने देते, ये सारे कि सारे देखने वाले।

नर्सेस केवल तब तक अच्छी हैं, जब घर से आतीं या घर जातीं,
सच पूछो तो यूनीफार्म पहनते ही,येपूरी चुडैलों सी हो जातीं
सुबह सवेरे से मिनट-मिनट में, इंजेक्शन खूब लगातीं हैं,
छलनी पड़े शरीर से, ये, बार-बार खून भर ले जातीं हैं।
ऐसा लगता है अपने कमरे में जाकर,सारा खून स्वयं पी जाती हैं।
रूप रावण का करके धारण फिर ये चिकित्सक आते हैं।
आँख दिखाओ, जीभ दिखाओ यहां दबाते, वहां दबाते पूरा जोर लगाते हैं।
इधर को उलटो उधर को पलटो ,पहले से हिले हुए शरीर को पूरा ही हिला जाते हैं।
अब कैसे अत्याचार हैं ढाने,कौनसे अस्त्र-शस्त्र चलाने,नर्सेस को समझा जाते हैं।
और सबसे ऊपर मिलने वाले,देखने वाले शुभचिंतक चाहने वाले
अपने मतलब के लिए मतलबी, मात्र एक हाजरी लगाने वाले।
इन्हें चिंता नहीं कोई मरीज की, स्वस्थ रहे या अस्वस्थ हो जाए
तू हो आया वो हो आया,मैं भी जाऊंगा कहीं बुरा न माने बस competition लगा रहे हैं।
अरे तेरे को अभी तक पता नहीं चला,कह कर आगे औरों को बता रहे हैं।
किसी से मत कहना तुम्हें अंदर की बात बताता हूं,ये सब क्या करने आते हैं
ये कब तक जिएगा,कब मर जाएगा,किसको क्या दे कर जाएगा बस यही देखने आते हैं।
ये सारी बेकार की बाते, सच यह है कि जब मैं अस्पताल आया था,
मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ था,जीवन मृत्यु से उलझ रहा था,
यमदूतों से जकड़ा हुआ था, यमराज से झगड़ रहा था।
नर्सों की मेहनत डाक्टरों की कोशिश,अपने चाहने वालों की दुआएं,
सेवा करने,मिलने वालों की शुभकामनएं,आर्शीवाद,प्रार्थनाएं।
इन सबने ऐसा जोर लगाया,यमदूत चिल्लाए,यमराज घबराए।
ये सारे के सारे मिल कर, यमलोक से मुझको छीन ले आए ।।
ये सारे के सारे मिल कर, यमलोक से मुझको छीन ही आए ।।

अनिल नासा

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