Wednesday, September 2, 2015

सर्दी में सूखे पर सुला गीले में खुद मां सो जाती थी

दिन रात भीगती मां की होली रोज ही हो जाती थी


काजल के टीके बालों के नीचे छिपा मां हमेशा लगाती थी


वो भाल (माथे) पर मेरी रोली सी सज जाती थी 


बुरी नजर किसी की भी छू मुझे नहीं पाती थी


छोटी-छोटी अटखेलियों पर मेरी मां चूम लेती थी


हर नई चपलता बताने को मोहल्ले में घूम लेती थी 

मेरे दुख में क्या खुख में भी आंख तेरी भर आई थी


माता तेरी आंखों में हर दम मेरी ही परछाई थी


अब होली में क्या कौन सा रंग गुलाल लाऊं में 


तेरे बिन हर रंग है फीका कौन रंग लगवाऊं में


जितना रंग होली का तू गालों से मेरे छुड़ाती थी


मेरे रोने पर पूरी दुनिया को दुष्ट बताती थी


हर होली,  कहने पर मेरे गर्म गुजिया फूंक मार खिलाती थी


स्वादिष्ट पकवान व्यंजन मेरे लिए ही हाथ से बनाती थी


तेरे हाथ से छुड़ाए रंगों के रंग आज भी मेरे गालों पर हैं


हजारों रंगों से रंगीन, तेरे स्नेह स्पर्ष मेरे सर के बालों पर हैं 


नहीं दिखता रंग कोई रंगीन तेरे बिन मुझे हे माँ


खुश होगा ईश्वर मुझसे ले बना कर तुझे अपनी मां


न चाहिए मुझे गुलाल ,रंग भी न कोई पिचकारी ही


लौटा दे मेरी माँ करनी मुझे होली की तैयारी भी........