मन की गहन घाटियों का चित्र है हाइकु-संग्रह काँच-सा मन- पुस्तक समीक्षा
विजय कुमार शर्मा
भावनाओं का समुंदर हैहाइकु-संग्रह काँच-सा मन। ऐसा प्रतीत होता है
मानो समुद्र सी प्रवाहित होती गहन निर्मल भावनाओं को गागर में परोस कर रखा गया है।
मुझे तो हर छंद एक महाकाव्य सा लगता है। जितनी बार पढ़ता हूँ उतना ही अनपढ़ा सा
लगता है हर बार कुछ नया सा लगता है। कहते हैं हाइकु छोटे छंद हैं पर इनमें पीर बड़ी
है, सच ही है। कौनसा चौबारा है, कौनसा किनारा, कौनसा क्षितिज है, कौनसी गहराई है,
कौनसा अंधेरा है, कौनसा प्रकाश है, कौनसा अवसाद है, कौनसा उल्लास है, जो इस हाइकु
संग्रह से अछूता है। मुझे अनायास या सायास ढूँढे नहीं मिला और मुझे लगता है इस सब
को तलाशने की आवश्यकता भी नहीं है। काँच के इस मन के छोटे से छंद एक मोह जाल हैं।
छोटा सा छंद आमंत्रित करता है फिर दूसरे छंद को सौंप देता है फिर तीसरे को और... और
हर छंद एक कथा से, एक संदेश से, एक देश से, एक भाव से जुड़े अनेक भावों में ले जा
कर सोचने पर विवश कर देता है। उस मनोरम चित्र में उलझा देता है जो भावना जी का
काँच-सा मन बना रहा है।
साहित्य का छात्र रहा हूँ कविता के काव्य सौष्ठव के प्रश्न हल करने
में भाषा, छंद, अलंकार और न जाने कितने ही प्वाइंट बना कर अंक बटोरता था पर इस काव्य
संग्रह को पढ़ने के पश्चात अपने को ही अपने आप से अंक देने का मन कर रहा है वह भी
सौ प्रतिशत क्योंकि आज मैं काँच के मन के पार देख पा रहा हूँ। पूरा ही संग्रह
काव्य सौष्ठव, सौष्ठव की हर कसौटी पर खरा
है जो चित्र बनाए गए हैं वो मानस और चित्त पर अंकित हैं। सहृदय कवयित्री का
काँच-सा मन निर्मल है।कभी कवयित्री का मन आशंकित है, कभी प्रफुल्लित है, कभी शांत है, कहीं विश्रांत है, पर है सत्य को प्रतिबिंबित करता हुआ। कवयित्री का
मन क्षुब्ध है आपसी खींच-तान को, आपसी बैर भाव को देख कर। वह लिखती है - कितने
ईश/हैं गढ़े मनुज ने/ प्रभु तो एक।।
फिर भी आशावान है - मन शांत हो/जीवन सुखमय/सबका सदा। कवयित्री का सृजन स्वांतय
सुखाय नहीं वासुधैव कुटुंबकम् के उपनिषदीय संदेश से प्रेरित है कवयित्री का दर्शन स्पष्ट
है .. धर्म सखा हो/ करुणा से उपजे/प्रेम आपसी। क्या यह मात्र एक कथन है! नहीं! इसमें कवयित्री के जीवन भर
के संस्कार, अध्ययन, अर्जन, मनन, चिंतन और भी न जाने किस-किस का संचयन है। इन
कविताओं की गहराई तक जाने के लिए समझना होगा ..बंधी तटों से, चलती है नदिया, गहरा पानी।। भले ही छंदबद्ध है, पूरा संग्रह, पर गहराई बहुत है। प्रकृति का चित्रण और मानवीकरण अदभुत है। इस
क्षमता और कला को नमन है। गहरी से गहरी बात कवयित्री पक्षी,चाँद,तारे,आकाश, धरा, कोपल, पेड़, पौधों, मौसम, तीज-त्यौहार आदि सबसे
कहलवाती हैं और ये सबके मन में बैठाती भी है, आशावादिता और प्रेरकता का एक चित्र...नन्हें पंखों से, छूकर आकाश को, फिर लौंटेंगे। प्रकृति की हर छटा में भावना जी का मन सबसे अधिक रमता है इससे पता
चलता है जो इस बात का संकेत है कि इनका ईश्वर की सत्ता पर कितना अडिग विश्वास है
औरईश्वर से कितना अधिक प्रेम है।
जीवन के प्रति सहज बने रहने का गुण, जीवन के अनुभवों से सिद्ध है, जो सीखा अनुभव से तिक्त, सुहानी/ जीवन की ऋतुएं/लिखें कहानी।, पूरा जीवन सुख सुविधा जुटाने में नहीं गंवाना चाहती कवयित्री, दिन के सिक्के/ जिंदगी की गुल्लक/ लीलती जाती। इस बात की चिंता रहती है। कवयित्री जानती है कि सफलता यहीं भी है और कहीं भी है। प्रयास न छूटे मंजिल पर पहुँच ही जाएंगे ..... दूर कहीं है/ सपनों की दुनिया/, चलते रहो।। कवयित्री विश्वभर की महिलाओं को जागृत करना चाहती है सशक्त बनाना चाहती है और महिला की शक्ति पर पूरा भरोसा रखती है वो आह्वाहन करती है , मैं औरत हूँ/ खुद से वादा मेरा/न हारूँ कभी।। महिला के उस धीरज को नमन जिसे कवयित्री ने इतने सरल शब्दों में पर इतने सुंदर तरीके से कहा है ..सदा से भरी, धीरज की गागर , रीतेगी नहीं।।
किसी का अहित कर सुख कभी भी गंवारा नहीं - आगे बढ़ना/ काट गले सबके/क्या प्रतिस्पर्धा?क्योंकि वे जानती हैं मन माटी के/निर्मल कोमल हैं/झरे ठेस से। इसलिए स्वप्न में भी, अनजाने में भी किसी का हृदय नहीं दुखाना चाहतीं। कवयित्री को दिखावे
के प्रेम की लालसा नहीं, शब्दों में बंध/खो देता एहसास/प्रेम- निर्झर।
ये तो निष्काम निर्झर अनवरत बहने वाली सलिला है जो मेरे मन को, इसके
मन को, उसके मन को और सबके ही मन को रसासिक्त करती है। प्रेम सलिला, बहा ले जाती, संग अपने।। कवयित्री का मन वास्तव में इतना निष्कपट है कि प्रेम की ही भाषा
समझता है और जहां प्रेम नहीं वहां ..किया तर्पण/ भर अंजुरी जल/छूटे बंधन।
कवयित्री बेटी भी है माँ भी। दोनों ही संबंधों में माँ के स्थान को
भली भांति जानती है कहीं माँ की लड़ली हो जाती है, सब कष्टों से, छिपाए आंचल में, वो ही तो माँ है।। यहां एक -एक शब्द के
द्वारा माँ की ममता, त्याग, स्नेह समर्पण का पूरा चित्र कवयित्री ने सुंदर तरीके से उकेरा है।
वहीं दूसरी ओर बच्चों से लाड़ करती है संबंधों को पूरी जीवंतता से जीया है तभी तो
कवयित्री का ये काँच-सा मन इतना निखर पाया है। सदा वारती/फिर भी न हारती/जननी वह।
कवयित्री का मानना है जहां काँच-सा मन ईश्वर के प्रेम में निष्छल भाव
से लीन है अपने स्वार्थ के लिए आस नहीं करता वहीं बिना दरके स्वच्छता से स्नेह को
प्रतिबिंबित करता है, मन मिला रहेगा प्रेम बना
रहेगा, जीवन का पहिया समतल राह पर चलता रहेगा डोर नेह की/रखती उलझाए/बिन बांधे भी।। जीवन को सरल, सुगम और सार्थक बनाने में सहयोगियों की भूमिका से भी कवयित्री मना
नहीं करती दुआ दोस्तों की,
रूपहली
धूप-सी, हर्षाए मन। शब्द की महिमा और ताकत को
कवयित्री पहचानती हैं उनका मानना सही है कि शब्द की सीपी, सब भाव छिपाए, मन के साए।। और गुरु ही शब्द से परिचित करवाते हैं हमारा जग से साक्षात्कार
करवाते हैं हर मार्ग को पार करने का मार्ग दिखते हैं उनको नमन, बांटते गुरु ज्ञान के हीरे -मोती, अनूठी ज्योति।। काँच-सा मन है पर उस पर
अंकित हर शब्द जिस भाषा में अंकित है उस पर गर्व ही नहीं अभिमान भी है कवयित्री को
पेशे से, कर्म से धर्म से हिंदी
प्रेमी भावना जी के मन से मेरी है शान, है मान अभिमान, हिंदी जबान।।
जीवन में उल्लास का, हास का परिहास का, गांव से मिली माटी की सौंधी सी महक लिए परिवेश का, चूल्हे की रोटी के स्वाद का, धान में पकाए आम का, गाय के चारे की नाँद का, इसी तरह की कितनी ही यादों का सागर भरा है भावना जी के काँच-सा मन
संग्रह में - भीनी सुगंध, सुनहरे पलों की , महके सदा।।
हृदय की कोमल भावनाओं को उज्ज्वल काँच से आर-पार देखा है। मन की गहन
घाटियों में उतरती-चढ़ती पगडंडियों को मन से उकेरा है। मानव के मानव से क्षणभंगुर
टूटते संबंधों को जुड़ाव से जोड़ा है। भौतिक साधन कितने ही जुटे पर प्रेम सूर्य
लाता आत्मा का सवेरा है...
इस संग्रह के लिए , संग्रह में व्यक्त विचारों
के लिए, हाइकु कविता में आपके
योगदान के लिए, साहित्य प्रेमियों में आपके
सम्मान के लिए हृदय से शुभकामनाएं।
काँच-सा मन
तपस्वी सी साधना
शुभ कामना।।
पुस्तक – काँच-सा मन – हाइकु-संग्रह
हाइकुकार – भावना सक्सैना
पृष्ठ संख्या -104, आईएसबीएन – 978-93-89999-73-0
मूल्य – रुपए 220/-
प्रकाशक – अयन प्रकाशन, 1/20 महरौली, नई दिल्ली ayanprakashan@gmail.com


No comments:
Post a Comment